मन्क़बत

on Thursday, 30 July 2015
                
  कुछ ऐसा फैज़ मिलता हे रज़ा के आस्ताने से 
  अकीदा ठोस होता हे बरेली आने जाने से 

 रज़ा का नाम चमका हे मदीने की तजल्ली से 
 मिटा हे न मिटेगा ये किसी के भी मिटाने से

 मैं रज़वी हूँ मुझे दुनिया रज़ा का शेर कहती हे
 ए नज्दी तू न टकराना रज़ा के इस दीवाने से 

 ये वो अहमद रज़ा हे जिसने निस्बत को ज़िया बख्शी 
  लिपट कर खूब रोया हे नबी के आस्ताने से 

ज़माना  इस लिए अहमद रज़ा को याद करता हे 
बला की उनको निस्बत थी मोहम्मद के घराने से 

मुजद्दिद तो बहुत गुज़रे ज़माने से मगर हसरत 
मेरे अहमद रज़ा जैसा नहीं गुज़रा ज़माने से