उतर जाए सफीने से

on Sunday, 7 October 2012
सदा आती है ये अक्सर तड़प के मेरे सीने से
तेरे क़दमों में दे दूं जां जुदा रहकर के जीने से



मोहब्बत के मुसाफिर को कभी मंजिल नहीं मिलती
जिसे साहिल की हसरत है उतर जाए सफीने से


मोहब्बत जो भी करते हैं बड़ी तकदीर वाले हैं
चमक जाती हैं तकदीरें मोहब्बत के नगीने से



तेरी यादों के जुगनू हैं तेरी खुशबू हे साँसों में
यही मोती मिले मुझको मोहब्बत के खजीने से


किसी आशिक की तुर्बत पे ग़ज़ल मैंने पढी हसरत
मुक़र्रर की सदा आई अचानक उस दफीने से

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