हयात हमने गुज़री हे इन्तेहाँ की तरह

on Thursday, 5 March 2015
लहू से जिसको के सींचा था बागबां की तरह
वही चमन नज़र आता हे अब खिज़ां की तरह 

हवा का झोंका भी आया तो रोक लूँगा उसे 
खड़ा हूँ तेरी हिफाज़त में पासबां की तरह 

                                                  कभी हयात में हमको सुकूं  मिला ही नहीं                                                     के रोज़ो शब् नज़र आते हैं कारवां की तरह 

खुदा की याद में खुद को मिटा लिया जबसे 
मेरा वजूद ज़मीन पर हे आसमां की तरह 

ये तज़र्बे  बड़ी मुश्किल से पाये हैं हमने
हयात हमने गुज़ारी हे इन्तेहाँ की तरह 

वो जिसको लोग बुरा आदमी बताते थे 
सुलूक़ मुझसे किया उसने मेहरबां की तरह 

तमाम उम्र गुज़ारी हे मैंने ख़्वाबों में 
मुझे लगे हे हकीकत भी अब गुमां की तरह 

ज़ुबान खोल दी मैंने तो तेरी खैर नहीं 
इसी सबब से खड़ा हूँ मैं बेज़ुबां की तरह 

वो जिसके वास्ते खुद को मिटा दिया हमने 
भुला दिया हे हमें उसने दास्ताँ की तरह 

अजीब हाल हे हसरत जहाँ के लोगों का 
यहाँ यहाँ की तरह हैं वहां वहां की तरह 
  

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