अश्क़ों की धार में

on Thursday, 5 March 2015
सोचा था हमने फूल खिलेंगे बहार में
सींचा चमन लहू से इसी ऐतबार में

दिल भी नज़र भी ख़्वाब भी सब आपके हुए
कुछ भी नहीं  हे अब तो मेरे  इख्तियार  में

ए  सग तेरे  नसीब का  क्या तज्क़रा  करूं
तू  आये  जाए  रोज़  सनम  के  दयार  में

होशो हवास अक्लो  खिरद हसरतें तमाम
सब  कुछ  लुटा  दिया  हे  तेरे  इंतज़ार में

कोशिश अदू की नीचा दिखाने की हे मगर
हरगिज़  कमी  न  आएगी  मेरे  वक़ार में

आया  वफ़ा की  राह  में  कैसा मकाम  ये
अब  ज़िन्दगी  खड़ी हे ग़मों की क़तार में

कोशिश के बावजूद भी कटती नहीं हे शब
उठ  उठ  के  बेठता  हूँ  तेरे  इंतज़ार  में

हसरत वफ़ा की राह में सब कुछ लुटा दिया
सपने  तमाम  बह  गए  अश्क़ों की धार में

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