नात शरीफ़

on Tuesday, 19 January 2016

दुनिया मैरे आक़ा की है उक़बा मेरे आक़ा का 
बंटता है दोनों आलम में सदक़ा मैरे आक़ा का 

रोयेंगे अपनी क़िस्मत पे सारे नज्दी महशर में 
रोज़े महशर जब देखेंगे जलवा मेरे आक़ा का 

आपकी अज़मत पे क़ुर्बा है बच्चा बच्चा मिल्लत का 
होता है सारे आलम में चर्चा मेरे आक़ा का 

मौत मुझे आगोश में लेने पास मेरे जब भी आये 
उस दम मेरे विर्दे जुबां हो कलमा मेरे आक़ा का 

अर्शे आज़म रब से बोला तेरी शफ़क़त के सदके 
तेरे करम से चूम लिया है तलवा मेरे आक़ा का 

उम्मत मेरी बख्श दे मौला बख्श दे मेरी उम्मत को 
हश्र में सबको बख्शायेगा सजदा मेरे आक़ा का 

दुनिया में भी परचम उनका  हसरत देखो औज़ पे है 
हश्र के दिन भी लहराएगा झंडा मेरे आक़ा का 


वफ़ा कैसे मिलेगी

on Saturday, 16 January 2016

2211 2211 2211 22
नादान भला तू ही बता कैसे मिलेगी 
आंधी से चराग़ों को वफ़ा कैसे मिलेगी 

मुंसिफ़ भी उसी का है उसी की है अदालत 
क़ातिल को गुनाहों की सज़ा कैसे मिलेगी 

हर गुल को सिखा देते हो नफ़रत का सलीक़ा 
गुलशन से तुम्हें बू ए वफ़ा कैसे मिलेगी 

तडपेगा बहुत रोयेगा  दुनिया में सितमगर 
जल्लाद को आसान क़ज़ा कैसे मिलेगी 

ये सोच के कल रात को रोया हूँ बहुत मैं 
दिल तोड़ने वाले को दुआ कैसे मिलेगी 

हसरत तू बता मैं तो बहुत ढूंढ चूका हूँ 
माँ जैसी ज़माने में वफ़ा कैसे मिलेगी 

मोहब्बत कौन करता है

कराके मुल्क में दंगे हुकूमत कौन करता है 
पता सबको है नफरत की सियासत कौन करता है 

इधर नफरत के सौदागर उधर सरहद के रखवाले 
वतन तू ही बता तेरी हिफाज़त कौन करता है 

पुराने हो गए किस्से सभी फ़रहाद शीरीं के 
फ़कत जिस्मों की चाहत है मोहब्बत कौन करता है 

यही हालात कहते हैं यही मंज़र बताते हैं 
ग़रीबों की ज़माने में हिमायत कौन करता है 

अदा हमने किये हैं साया ए तलवार में सजदे 
ख़ुदा की इस तरह जग में इबादत कौन करता है 

सभी मशरूफ़ हैं मक्कारियों की चालसाज़ी में 
कहाँ अखलाक़ वाले हैं मुरव्वत  कौन करता है

सभी अहले वतन खुश हों रहे अमनो अमां कायम 
तमान्ना किसकी ऐसी है ये हसरत कौन करता है 

अब संवरता है कौन दुनिया में

on Thursday, 14 January 2016
इश्क़ करता है कोन  दुनिया में
दिल से मरता है कोन दुनिया में


मुफ़्त शेखी बगारने वाले 
तुझसे डरता है कोन दुनिया में 

महवे हैरत है आसमां मुझ पर 
आहें भरता है कोन दुनिया में 

आईना बन गए हैं हम लेकिन 
अब संवरता है कौन दुनिया में 

सबको करना है कूच दुनिया से 
कब ठहरता है कौन दुनिया में 

अब न मुंसिफ़ कोई उमर जैसा 
अद्ल करता है कौन दुनिया में 

दिल की गहराई से तुझे हसरत 
याद करता है कौन दुनिया में 

मदीने में

on Monday, 16 November 2015

तमन्ना है यही मेरी यही हसरत है सीने में 
मुझे उम्मीद है आक़ा बुलाएँगे मदीने में 

नहीं मुमकिन डुबो दे ये भंवर मेरे सफीने को 
नबी के नाम का परचम लगाया है सफीने में 

अक़ीदत से जो मांगोगे मिलेगा बिलयकीं तुमको 
कमी थी न कमी है मेरे आका के खजीने में 

लगा ले गर इसे दुल्हन महक जाएँ कई नस्लें 
बसी है ऐसी खुशबु मेरे आक़ा के पसीने में 

मुझे अपने ग़ुलामों की ग़ुलामी में सदा रखना 
मैं पत्थर हूँ मेरे आक़ा बदल दीजे नगीने में 

कोई हसरत नहीं बाक़ी मेरे दिल में सिवा इसके 
मेरी जब भी क़ज़ा आये तो आये बस मदीने में 

कोई हसरत नहीं आक़ा मेरे दिल में सिवा इसके 
मुझे भी मौत से पहले बुला लेना मदीने में 

खफा खफा ही लगे

on Monday, 28 September 2015
पिला दे ज़हर भी तू तो मुझे  दवा  ही लगे 
तेरा कसूर भी मुझको तेरी अदा  ही लगे 

हबीब बनता हे रखता हे बुग्ज़ दिल में मगर 

हर एक उसकी दुआ मुझको बद्दुआ ही लगे 

मिला हे हंस के वो मुझसे मेरे गले भी लगा 

मगर मुझे तो वो अब भी खफा खफा ही लगे 

गुज़र गया हे ज़माना बहार  देखे हुए 

ये खिड़की खोलो ज़रा सुबह की हवा ही लगे 

अजीब हाल हे दिल का न पूँछ मेरे सनम

मेरे करीब हे लेकिन जुदा जुदा ही लगे 

यही दुआ हे ये हसरत हे आरज़ू हे मेरी 

गुलाब जैसा ये चेहरा खिला खिला ही लगे 

नात ए पाक

on Saturday, 8 August 2015









ये जो तख्लीके दुनिया हे नबी की ही बदोलत है 
सना ए मुस्तफ़ा करना वज़ीफ़ा हे इबादत है 

ख़ुदा को हमने जाना हे मुहम्मद के बताने से 
उन्ही का ही करम हे ये ,ये उनकी ही इनायत है 

जहाँ में ख़ूब जपता हे तू माला शिर्क़ो बिदअत की 
तू सुन ले ग़ोर से नज्दी तेरी महशर में शामत है 

ज़ियारत ख़्वाब में होती हे उनको ही शहे दीं की 
दरुदे पाक के नगमे सजाना जिनकी आदत है 

फ़रिश्ते अर्श से करने ज़ियारत इनकी  आते हैं
गुलामाने मोहम्मद की ये अज़मत शानो शोक़त है 

ख़ुदा ने कर दिया आला मकामे आले अतहर को 
मोहम्मद के घराने की तो दो आलम में शोहरत है 

वहाँ खैरात बंटती हे यहाँ भी भीख मिलती है 
वहाँ उनका हे मोज़ज़ा यहाँ इनकी करामत है 

मोहम्मद के तवस्सुल से ख़ुदा हमको मिला हसरत 
जो आशिक़ हैं मोहम्मद के उन्ही के नाम जन्नत है