मन्क़बत

on Thursday, 30 July 2015
                
  कुछ ऐसा फैज़ मिलता हे रज़ा के आस्ताने से 
  अकीदा ठोस होता हे बरेली आने जाने से 

 रज़ा का नाम चमका हे मदीने की तजल्ली से 
 मिटा हे न मिटेगा ये किसी के भी मिटाने से

 मैं रज़वी हूँ मुझे दुनिया रज़ा का शेर कहती हे
 ए नज्दी तू न टकराना रज़ा के इस दीवाने से 

 ये वो अहमद रज़ा हे जिसने निस्बत को ज़िया बख्शी 
  लिपट कर खूब रोया हे नबी के आस्ताने से 

ज़माना  इस लिए अहमद रज़ा को याद करता हे 
बला की उनको निस्बत थी मोहम्मद के घराने से 

मुजद्दिद तो बहुत गुज़रे ज़माने से मगर हसरत 
मेरे अहमद रज़ा जैसा नहीं गुज़रा ज़माने से  

हो के मजबूर उसूलों से बग़ावत की है

on Thursday, 16 April 2015









  जाने  क्या सोच के उसने ये हिमाक़त की है 
   हो के दरिया जो समंदर से अदावत  की है

 खींच लायी हे तेरे दर पे ज़रुरत मुझको 
हो के मजबूर उसूलों से  बग़ावत की है 

हमने ख़ारों पे बिछाया हे बिछोना अपना 
हमने तलवारों के साये में इबादद की है 

अच्छे हमसाये की तालीम मिली हे हमको 
हमने जाँ दे के पडोसी की हिफाज़त की है 

आज आमाल ही पस्ती का  सबब  हैं  वरना
हमने हर दौर में दुनिया पे हुकूमत की है 

दम मेरा कूच -ए -सरकार  जाकर निकले 
 इस तमन्ना के सिवा  कुछ भी न हसरत की है   

अश्क़ों की धार में

on Thursday, 5 March 2015
सोचा था हमने फूल खिलेंगे बहार में
सींचा चमन लहू से इसी ऐतबार में

दिल भी नज़र भी ख़्वाब भी सब आपके हुए
कुछ भी नहीं  हे अब तो मेरे  इख्तियार  में

ए  सग तेरे  नसीब का  क्या तज्क़रा  करूं
तू  आये  जाए  रोज़  सनम  के  दयार  में

होशो हवास अक्लो  खिरद हसरतें तमाम
सब  कुछ  लुटा  दिया  हे  तेरे  इंतज़ार में

कोशिश अदू की नीचा दिखाने की हे मगर
हरगिज़  कमी  न  आएगी  मेरे  वक़ार में

आया  वफ़ा की  राह  में  कैसा मकाम  ये
अब  ज़िन्दगी  खड़ी हे ग़मों की क़तार में

कोशिश के बावजूद भी कटती नहीं हे शब
उठ  उठ  के  बेठता  हूँ  तेरे  इंतज़ार  में

हसरत वफ़ा की राह में सब कुछ लुटा दिया
सपने  तमाम  बह  गए  अश्क़ों की धार में

हयात हमने गुज़री हे इन्तेहाँ की तरह

लहू से जिसको के सींचा था बागबां की तरह
वही चमन नज़र आता हे अब खिज़ां की तरह 

हवा का झोंका भी आया तो रोक लूँगा उसे 
खड़ा हूँ तेरी हिफाज़त में पासबां की तरह 

                                                  कभी हयात में हमको सुकूं  मिला ही नहीं                                                     के रोज़ो शब् नज़र आते हैं कारवां की तरह 

खुदा की याद में खुद को मिटा लिया जबसे 
मेरा वजूद ज़मीन पर हे आसमां की तरह 

ये तज़र्बे  बड़ी मुश्किल से पाये हैं हमने
हयात हमने गुज़ारी हे इन्तेहाँ की तरह 

वो जिसको लोग बुरा आदमी बताते थे 
सुलूक़ मुझसे किया उसने मेहरबां की तरह 

तमाम उम्र गुज़ारी हे मैंने ख़्वाबों में 
मुझे लगे हे हकीकत भी अब गुमां की तरह 

ज़ुबान खोल दी मैंने तो तेरी खैर नहीं 
इसी सबब से खड़ा हूँ मैं बेज़ुबां की तरह 

वो जिसके वास्ते खुद को मिटा दिया हमने 
भुला दिया हे हमें उसने दास्ताँ की तरह 

अजीब हाल हे हसरत जहाँ के लोगों का 
यहाँ यहाँ की तरह हैं वहां वहां की तरह 
  

जिंदा लाश जलाई है

on Tuesday, 21 October 2014

कौम पे मेरी मेरे मौला कैसी मुश्किल आई है
ग़ैरत का एहसास नहीं हे भाई का दुश्मन भाई है


करबल की तारिख में हमने इस मंज़र को देखा हे
जितने सच्चे लोग हैं उनके हिस्से में तन्हाई है


जिस गुलशन का पत्ता पत्ता प्यार की बातें करता था
अम्न के उस गुलशन में आखिर किसने आग लगायी है


कल मुन्शिफ के सामने ये सच्चाई जाने वाली थी
जिसकी तुमने चोराहे पर जिंदा लाश जलाई है


जब भी कोई बम फटता हे नाम हमारा आता है
"हसरत" ये इलज़ाम नहीं हे बलके इक सच्चाई है  

जब से गैरों के घर आना जाना हुआ

on Friday, 12 September 2014
                    


                                  जब मेरी जीस्त में उनका आना हुआ

                                  वादिये दिल  का मौसम सुहाना हुआ

                                  जब से वो बस गए आके दिल में मेरे
                                  दिल मेरा इक हसीं आशियाना हुआ

                                  कब से दिल को बचाकर रखा था मगर
                                  उनकी नज़रों का पल में निशाना हुआ

                                  बदले बदले से वो मुझको आये नज़र
                                  जब से ग़ैरों के घर आना जाना हुआ

                                 इस क़दर गिर गया वो नज़र से मेरी
                                अब तो मुश्किल ये रिश्ता निभाना हुआ

                                वो भी क्या दिन थे जब साथ थे वो मेरे
                                अब तो हसरत ये किस्सा पुराना हुआ 

बहल जायेगा दिल बहलते बहलते

on Saturday, 23 February 2013
इन आँखों से आंसू निकलते निकलते
कटी  रात करवट बदलते बदलते

मोहब्बत हे मुझसे तो कह दो किसी दिन
इशारे से छत  पर टहलते टहलते

मोहब्बत की राहों  में  कांटे मिलेंगे
उठाना क़दम तुम संभलते संभलते     

यकीं हे  मुझको के इक रोज़ खुद ही
बहल जायेगा दिल बहलते बहलते

मेरी याद जब जब सताएगी हसरत
वो रोयेंगे आँखें मसलते मसलते